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जय - जय - जय जन गण वन्दन,
भारत माँ का यह पावन सरगम ।
सुर संस्कृति की नदियों में बहती,
धाराओं का अविरल स्पन्दन।
इस सरगम का धर्म आन हैं,
नीतिवान और पौरूष हैं इसकी शान।
पर हम भूल गये थे ये सरगम,
याद रहा केवल अपना मन।
हम बने अनेकों से बसे अनेको में,
पर मन बसता इस इस सरगम में।
ऐसे सरगम की जयगाथा में,
हम राष्ट्र धर्म का करते वन्दन।
जय - जय - जय जन गण वन्दन,
भारत माँ का यह पावन सरगम।
आज खड़े नमन कर रहे,
अपनी झाँसी रानी का बलिदान।
और संजो रहे अपनी स्मृतियों में,
अमर सपूतों का गुणगान।
ऐसी बलिदानी माटी से सृजित हुआ,
यह तीन रंगों का पावन परचम।
जय - जय - जय जन गण वन्दन,
भारत माँ का यह पावन सरगम।
पुष्पांजलि हम अर्पित करते,
सरगम के इस अर्चन की।
ऐसे अर्चन से फलीभूत हो,
हम सबके अन्तः समन।
राष्ट्र धर्म का ऐसा पावन सरगम,
अब क्यों भूलते जा रहे है हम।
आज इस सरगम की वर्षगांठ पर,
हम सब करते है अभिनन्दन।
जय - जय - जय जन गण वन्दन,
भारत माँ का यह पावन सरगम।
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